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Bhagwan Shree Jagannath

Blog by Shailendra nath tiwari connectclue-author-image

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Lord Shri Jagannath

This is the story of Lord Shree Jagannath. Lord Shree Jagannath resides inside the grand temple in Orissa. Lord Jagannath has many secrets and many stories which impress the devotees. Lord Shri Jagannath performs many Leelas with his devotees to keep the mind of his devotees. Lord Shri Jagannath along with his brother Shri Balarama and sister Subhadra resides inside the temple. King Indradyumna built the temple of Lord Sri Jagannath.



भगवान श्री जगन्नाथ


Lord Sri Krishna is worshiped in the form of Lord Jagannath. There are four eras on the earth, namely, Satya Yuga, Treta Yuga, Dwapara Yuga, Kalyug. Among these four Yugas, the most sacred age is called Satya Yuga.

In Satyuga, Maharaja Indradyumna discovered the idol of Lord Shri Jagannath ji. Lord Shri Jagannath is mentioned in many Puranas. In Skanda Purana, Lord Shri Jagannath is called Jagannath God. It is described in the Skanda Purana that the abode of Lord Jagannath, which is called Purushottam Kshetra, never gets destroyed.

This thing happened at that time when Lord Shri Krishna was performing many pastimes inside Dwarka in Dwapar Yuga. The child leela of Goddess Subhadra and Lord Shri Krishna was astonished to hear the child leela of Lord Shri Krishna. Shri Krishna's body started melting like wax due to utmost love. Prayed to the Lord, that just as you are full of love now, in the same way, by not looking at the sins of the living beings in Kaliyuga, be very kind to them. Lord Shri Krishna blessed Narada Muni and said that he Lord Shri Jagannath will be worshiped in the form of Lord Shri Jagannath in Kali Yuga and all the sins of the living beings will be destroyed just by seeing Lord Shri Jagannath once.



यह कथा है, भगवान श्री जगन्नाथ की l भगवान श्री जगन्नाथ उड़ीसा में भव्य मंदिर के अंदर निवास करते हैं l भगवान जगन्नाथ की कई सारी रहस्य और कई सारी कथाएं हैं जो भक्तों को प्रभावित करती है| भगवान श्री जगन्नाथ अपने भक्तों का मन रखने के लिए कई  लीला अपने भक्तों के साथ करते हैं| भगवान श्री जगन्नाथ अपने भाई श्री बलराम और बहन सुभद्रा के साथ मंदिर में अंदर स्थित रहते हैं| राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान श्री जगन्नाथ का मंदिर बनवाया था| 


     


                भगवान श्री जगन्नाथ का मंदिर 

 भगवान श्रीकृष्ण श्री  भगवान जगन्नाथ के रूप में पूजे जाते हैं l पृथ्वी के ऊपर चार युग होते हैं, सतयुग, त्रेता युग,  द्वापर युग,  कलयुग l इन चार युग में, जो सबसे पवित्र युग होता है उसे सत्य युग कहा जाता है l

 सतयुग में महाराजा इंद्रद्युम्न ने भगवान श्री जगन्नाथ जी की प्रतिमा का पता किया था| कई सारे पुराणों में भगवान श्री जगन्नाथ का उल्लेख मिलता है l स्कंद पुराण के अंदर भगवान श्री जगन्नाथ को जागृत भगवान कहा जाता है | स्कंद पुराण के अंदर वर्णन मिलता है कि भगवान श्री जगन्नाथ का धाम जिसे पुरुषोत्तम क्षेत्र कहते हैं,उसका  प्रलय कभी नहीं होता | 

 यह बात उस समय की जब भगवान श्री कृष्ण द्वापर युग में द्वारिका के अंदर कई सारी लीलाओं को कर रहे थे l एक बार भगवान श्रीकृष्ण अपनी ही माता देवकी के मुख से अपने ही बाल लीलाएं को सुनने का प्रयत्न कर रहे थे l उस समय भगवान बलराम, देवी सुभद्रा और भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं को भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं को सुनकर आश्चर्य चकित हो गए l श्रीकृष्ण का शरीर मोम की तरह,  अत्यंत प्रेम के कारण पिघलने लग गया l अचानक उसी समय, नारद मुनि पहुंच गए और उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण से प्रार्थना की, कि हे भगवान जिस प्रकार आप अभी अत्यधिक प्रेम से युक्त है, उसी प्रकार आप कलयुग में जीवो के पापों को नहीं देखते हुए उनके लिए अत्यंत अधिक कृपारूप धारण कीजिए l भगवान श्री कृष्ण ने नारद मुनि को आशीर्वाद देते हुए कहा कि वे कलयुग में भगवान श्री जगन्नाथ के रूप में पूजे जाएंगे और भगवान श्री जगन्नाथ का एक बार दर्शन करने मात्र से ही जीवो के सभी पाप नष्ट हो जाएंगे|

श्री कृष्ण भगवान हैं जो भक्तों के लिए अपने प्यार और स्नेह के लिए जाने जाते हैं। कृष्ण के पास विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ और विभिन्न प्रकार की शक्तियाँ हैं। दुनिया और कृष्ण के बारे में तरह-तरह की किताबें लिखी गई हैं। सुदर्शन कृष्ण का हथियार है। कृष्ण का अस्त्र अपनी प्रकृति और शक्ति के कारण बहुत कीमती है। सुदर्शन एक जीवित वस्तु के रूप में कार्य करता है। यह केवल धातु की चीज नहीं है। कृष्ण का एक अन्य हथियार कोमोदकी गदा है। अगला हथियार पांचजन्य शंख है। पांचजन्य शंख शत्रु को मारने के लिए बहुत बड़ी ध्वनि उत्पन्न करता है।

 
पुराणों में ब्रह्म का वर्णन मिलता है | परब्रह्म का अर्थ है वह दिव्य परमात्मा जो सभी जीवो के अंदर वास करता है तथा सभी जीवो को सुरक्षा प्रदान करता है | ब्रह्म कहीं पर भी आ जा सकता है l ब्रह्म बिना हाथ की किसी को भी छू सकता है l ब्रह्मा बिना पैर के कहीं पर भी जा सकता है l ब्रह्म बैठे बैठे किसी भी एक स्थान से दूसरे स्थान को जा सकता है | श्री कृष्ण ने द्वारका में स्थित रहते हुए भी हस्तिनापुर के अंदर हो रहे अन्याय को रोका था | भगवान श्री कृष्ण ने दिव्य शक्तियों से महारानी द्रौपदी की रक्षा की थी | भगवान जगन्नाथ की मूर्ति में हाथ को नहीं बनाया गया हैै l इसके पीछे बहुत ही गूढ़ रहस्य हैै कि भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों की रक्षा बिना लौकिक हाथों की भी कर सकते हैं l उनका दिव्य अलौकिक हाथ हर जगह मौजूद है l भगवान जगन्नाथ अपनी अलौकिक शक्ति के द्वारा हर जगह, हर परिस्थिति में,  हर समय,  हर काल में हर जगह मौजूद है l सर्वव्यापी शक्ति के द्वारा हर जगह मौजूद है l और हर एक कार्यों को कर सकते हैं l भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों की रक्षा हेतु हमेशा तत्पर रहते हैं|

                           भगवान जगन्नाथ का प्रसाद जो भी एक बार खा लेता है, वह हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता है|

                          भगवान श्री जगन्नाथ की एक भक्तिन थी, जिनका नाम था कर्माबाई l  एक बार एक सन्यासी कर्माबाई के यहां से होकर गुजर रहा था l उस समय कर्माबाई भगवान जगन्नाथ के लिए खिचड़ी बना रही थी l  कर्माबाई ने दातून से ही खिचड़ी को हिलाना शुरू कर दिया l जब सन्यासी ने इस प्रकार करमा बाई को करते हुए देखा l उन्होंने करमा बाई को डांटते हुए कहा कि भगवान श्री जगरनाथ का भोग बनाने से पहले स्नान करना चाहिए तथा सभी पात्रों को धोना चाहिए |  कर्माबाई अगले दिन स्नान की और उसके बाद सभी बर्तनों को साफ किया l फिर उन्होंने बर्तनों में भगवान जगन्नाथ के लिए  भोग बनाना आरंभ किया l तब तक भगवान जगन्नाथ उनके यहां खाने के लिए आ गए | भगवान जगन्नाथ ने देखा कि माता कर्माबाई ने अभी तक खिचड़ी नहीं पकाया l फिर कर्माबाई ने कहा कि रुक जाओ  l उसके बाद उन्होंने खिचड़ी खाई और वापस अपने मंदिर को चले गए | लेकिन आज भगवान जल्दबाजी में वापस आए थे इसलिए उनके हाथ में खिचड़ी के दाना और मुंह में कुछ खिचड़ी लगी हुई थी l जब पुजारियों ने मंदिर का दरवाजा खोला तो देखा कि भगवान जगन्नाथ के हाथ और मुंह में खिचड़ी के कुछ दाने लगे हुए हैं l पुजारियों को आश्चर्य हुआ l और आश्चर्यचकित होकर भगवान से पूछने लगे l सभी पुजारियों ने भगवान से पूछा कि आपके मुंह में यह खिचड़ी कैसे लगी है क्योंकि हमने भोग में किसी प्रकार का कोई खिचड़ी नहीं दिया l तब भगवान ने कहा कि उनकी एक माता है जो कर्माबाई के नाम से गांव में रहती है | माता कर्माबाई को किसी सन्यासी ने कह रखा है कि स्नान करने और पूजा पाठ करने के बाद ही भगवान के लिए भोग बनाना चाहिए l इसलिए आज मुझे विलंब हो गया | भगवान ने उस सन्यासी को डांटते हुए भी कहा कि आज से मेरी माता को किसी भी प्रकार का शास्त्र का नियम मत कहना l मेरी माता के द्वारा बनाया हुआ खिचड़ी मुझे अत्यंत प्रिय है l जब कर्माबाई का स्वर्गवास हुआ था , भगवान श्री जगन्नाथ को बहुत दुख हुआ l और उन्हें रोता हुआ देखकर सभी पुजारियों ने कहा कि हमें भी भगवान श्री जगन्नाथ को खिचड़ी खिलानी चाहिए और सभी पुजारी ने मिलकर भगवान श्री जगन्नाथ के लिए खिचड़ी को बनाया l उसी समय से भगवान श्री जगन्नाथ को खिचड़ी देने की प्रथा आरंभ हो गई|


                           श्री बांके बिहारी


वृंदावन के अंदर भगवान श्री कृष्ण श्री बांके बिहारी के रूप में पूजे जाते हैं l भगवान श्री कृष्ण का कई सारे मंदिर स्थित हैं l भगवान श्रीकृष्ण वहां पर गोपाल के रूप में पूजे जाते हैं l और मान्यता है कि भगवान श्री बांके बिहारी एक जागृत भगवान है | 

 भगवान श्री कृष्ण वृंदावन के अंदर गोपाल रूप में रहते हैंंl  वहां पर उनकी प्रियसी का नाम श्रीमती राधारानी है और श्रीमती राधारानी वहां पर गोपी रूप में पूजी जाती हैं |  वृंदावन के अंदर कई सारे रहस्य स्थित हैं l भगवान श्री कृष्ण वृंदावन के अंदर अपनी दिव्य लीलाएं दिव्य शक्तियों के द्वारा करते हैंं | वृंदावन के अंदर एक रहस्यमई वन हैै , लोगों की मान्यता है कि वहां पर आज भी भगवान श्रीकृष्ण आते हैंं | लोग इसी मान्यता के आधार पर वहां पर कई सारे खाने योग्य पदार्थ वहां पर रखते हैं l और सुबह में वह सारी वस्तुएं खाई हुई लगती हैं l कई सारे भक्त लोग वहां जाकर भगवान को पहनने के लिए वस्त्र देते हैं | वह सभी वस्त्र भगवान श्री कृष्ण ग्रहण स्वयं ग्रहण करते हैं,  लोगों की  यह मान्यता है| यह अद्भुत वन  निधिवन के नाम से जाना जाता है | असल में यह कई सारे तुलसी वनों से बना हुआ है | वृंदावन के अंदर यमुना नदी भी बहती है l भगवान श्री कृष्ण को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए श्रीमती यमुना देवी ने कई वर्षों तक जल के अंदर स्थित होकर तपस्या की थी | भगवान श्री कृष्ण की कृपा प्राप्त होने पर उन्हें भी वृंदावन के अंदर वास करने का अवसर प्राप्त हुआ | मथुरा के अंदर गोवर्धन पर्वत भी स्थित है l गोवर्धन पर्वत को अद्भुत पर्वत कहा जाता है l गोवर्धन पर्वत का वर्णन कई सारे पुराणों और ग्रंथों में मिलता है l यह पर्वत भगवान श्री कृष्ण के द्वारा धारण किए जाने की वजह से भी बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है | देवराज इंद्र के घमंड को दूर करने के लिए भगवान श्री कृष्ण ने ही अपने हाथों पर गोवर्धन पर्वत को धारण किया था l इसीलिए भगवान श्री कृष्ण को गोवर्धनधारी भी कहा जाता है l कई सारे भक्त गोवर्धन पर्वत की परिक्रमा करके अपने को कृतार्थ मानते हैं l
                      
                        जय श्री द्वारिकानाथ


भगवान श्री कृष्ण का यहां पर सोलह सिंगार होता है और यहां भगवान श्री कृष्ण की पटरानी रुकमणी जी को माना जाता हैै l  रुकमणी के संग भगवान श्री कृष्ण की पूजा होती है l
   भगवान श्री कृष्ण योगेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं l भगवान श्री कृष्ण की  कई हजारों पत्नियां थी | भगवान श्री कृष्ण स्वयं द्वारिका के अधिपति है | फिर भी कई सारे मुनि और महर्षि भगवान श्री कृष्ण को योगेश्वर के रूप में पूजते हैं और भगवान श्री कृष्ण की कई सारी लीलाओं का मनन - चिंतन करते हैं l


                          जय श्री  बद्रीनाथ


 भगवान श्री कृष्ण बद्रीनाथ के रूप में पूजे जाते हैं l बद्रीनाथ के अंदर,  मंदिर के अंदर, भगवान श्रीकृष्ण नर और नारायण  के रूप में हैं l

                    ऐसा महाभारत में उल्लेख आता है कि करण को सिर्फ और सिर्फ नर मुनि ही मार सकते थे l स्वयं अर्जुन नर मुनि थे l उन्होंने ही उसका वध किया था l महाभारत की युद्ध से पूर्व राजा महाराज धृतराष्ट्र को चेतावनी देने के लिए स्वयं मुनि वेदव्यास जी ने यह कहा कि श्री कृष्ण और अर्जुन को साधारण मनुष्य नासमझ l  "हे राजा, श्री कृष्ण और अर्जुन नारायण और नर नामक मुनि  हैं l उन्होंने हजारों वर्षों तक तपस्या की थी l "

                    भगवान को मोहित नहीं किया जा सकता l कई लोग यह सोचते हैं कि भगवान श्रीकृष्ण को मोहित किया जा सकता है | श्रीमद्भागवत में यह वर्णन आता है कि नर और नारायण मुनि ने कई वर्षों तक घन घोर तपस्या की l उनकी तपस्या को देखकर देवराज इंद्र कोई भय लगने लगा कि कहीं वे उनका इंद्र पद ना मांग ले l इसीलिए उन्होंने वसंत ऋतु , कामदेव और कई सारी अप्सराओं को नर और नारायण की तपस्या को भंग करने के लिए भेज दिया l नर और नारायण तपस्या कर रहे थे, वहां पर जाकर वसंत ऋतु , कामदेव और अप्सराओं ने अपना नृत्य आरंभ किया l देवराज इंद्र के आदेश के कारण सभी नृत्य करने लग गई l और नर और नारायण को तपस्या से हटाने के लिए प्रयास करने लग गई l नर नामक मुन्नी को क्रोध आ गया और वह उन्हें मारने के लिए तैयार हो गए l लेकिन भगवान जो नारायण मुनि के रूप में थे, अत्यंत ही प्रसन्नता पूर्वक मुस्कुराते हुए नर नामक मुनि को शांत किया l फिर उन्होंने कहा कि आप व्यर्थ क्रोध कर रहे हैं l यह सभी देवराज इंद्र के आदेश से यहां पर आए हैं l इनका स्वयं कोई भी गलती नहीं है l  मुनि  ने अपनी जांघ से उर्वशी नामक अप्सरा को उत्पन्न किया l उर्वशी अत्यंत ही सुंदर थी l उस समय देवराज इंद्र  के द्वारा भेजी हुई अप्सराओं का मान भंग हो गया l उनका घमंड चूर हो गया. l उर्वशी के सामने अपने आप को  निम्न समझते हुए, उन्होंने नारायण मुनि से माफी मांगी l भगवान नारायण ने उन्हें माफ कर दिया l उसके बाद भगवान नारायण ने कहा कि तुम इस उर्वशी नामक अप्सरा को ले जाकर देवराज इंद्र को उपहार  स्वरूप  प्रदान करो और देवराज को कहना कि हमें उनका कोई इंद्र पद नहीं चाहिए l इसलिए  व्यर्थ चिंता ना करें l  नारायण मुनि ने कहा कि हम यह तपस्या जगत के कल्याण के लिए कर रहे हैं ना कि इंद्र पद को प्राप्त करने के लिए l  जगत में लोगों को यह समझना चाहिए कि यज्ञ करने  और तपस्या करने से मनुष्य की आयु की वृद्धि होती हैै, उनका कल्याण होता है l तपस्या जीवन का एक अभिन्न अंग है l मनुष्य को तपस्या करना चाहिए l इसीलिए हम यह तपस्या कर रहे हो l देवराज इंद्र  के द्वारा भेजी हुई अप्सराओं  ने अप्सरा उर्वशी को लेकर देवराज इंद्र के पास गई और भगवान नारायण के द्वारा कही हुई बात को उन्होंने कह दिया l तब नारायण मुनि की महानता को देखकर देवराज चकित हुए और उन्हें अपनी गलती का पश्चाताप हुआ l 



 भगवान श्री कृष्ण के पास अनंत शक्तियां हैं l उन सभी शक्तियों का वर्णन किसी भी एक किताब के द्वारा नहीं किया जा सकता l लेकिन ऋषि-मुनियों ने भक्त और भगवान के बीच में संबंध स्थापित करने के लिए और भक्तों को समझाने हेतु भगवान की कई सारी शक्तियों का वर्णन किया है l भगवान के पास  सोलह कलाएं है l  भगवान की एक शक्ति है का नाम है सृजन शक्ति l सिर्फ अपनी इच्छा शक्ति के द्वारा ही सारे सारे के सारे ब्रह्मांड का सृजन कर सकते हैं l


                                दिव्यास्त्र
                           सुदर्शन  चक्र   
                    Sudarshan chakra

 भगवान के कई सारे दिव्यास्त्र हैं l उनमें सबसे खतरनाक और सबसे भयंकर दिव्यास्त्र सुदर्शन  चक्र को कहा गया है l सुदर्शन चक्र बहुत ही भयंकर ज्वाला और अग्नि से युक्त होता है l सुदर्शन चक्र के अंदर से बहुत ही भीषण अग्नि निकलती है l लेकिन यह अग्नि सिर्फ दुष्टों का संहार करने के समय में ही प्रकट होती है l भयंकर जलाएं और भयंकर अग्नि चक्र के अंदर से बाहर की ओर निकलती है l 
 जब भगवान के भक्तों के पास सुदर्शन चक्र जाता है, (उनकी रक्षा हेतु) तब उस समय इस सुदर्शन चक्र से किसी प्रकार की ज्वाला और अग्नि नहीं निकलती है l किसी भी प्रकार का गर्मी महसूस नहीं होता है l यह भगवान के भक्तों को शीतलता प्रदान करता है l जो लोग भगवान का हमेशा ध्यान और चिंतन करते हैं, भगवान उनकी रक्षा के लिए अपने सुदर्शन चक्र को हमेशा छोड़ देते हैं l सुदर्शन चक्र भगवान के भक्तों को कष्ट पहुंचाने वाले दुष्टों का संहार करने में पूर्णतया  समर्थ होता है l सुदर्शन चक्र हमेशा भगवान के भक्तों की रक्षा के लिए तत्पर रहता है l

यह भगवान की तर्जनी उंगली में स्थित होता है और भगवान की इच्छा से अत्यंत तेज भी चलता है और जरूरत पड़ने पर धीमा भी पड़ जाता है l भगवान की शत्रु का संहार कर डालता है|
इसका संहार करने की क्षमता का इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह चक्र चाहे तो ही क्षण में कई सारे असुरों का वध कर सकता है | 

                 सुदर्शन  चक्र  की महिमा

 भागवत पुराण के अनुसार एक बार दुर्वासा मुनि महाराज महाराज अंबरीष से मिलने के लिए आए  l महाराज अंबरीष भगवान श्री हरि के अनन्य भक्त थे l भगवान श्री हरि का वह हर एक एकादशी व्रत करते थे l महाराज अंबरीष ने दुर्वासा मुनि को भोजन करने के लिए कहा l दुर्वासा मुनि ने कहा कि वे स्नान करने के पश्चात जलपान ग्रहण कर सकते हैं l दुर्वासा मुनि स्नान करने के लिए नदी के तट पर चले गए l दुर्वासा मुनि वहां पर जाने के पश्चात ध्यान के अंदर चले गए l समाधि करने लग गए और उन्हें यह ध्यान भी नहीं रहा कि उन्हें जलपान करने के लिए महाराज अंबरीष के पास जाना है l इधर महाराज  का एकादशी व्रत का पारण का समय समाप्त होने वाला था l
 महाराज ने मुनि से पूछा कि उन्हें क्या करना चाहिए l मुनि ने विचार करके कहा - तुलसी का जल पी लेने मात्र से पारण हो सकता है l और उन्हें किसी भी प्रकार का पाप नहीं लगेगा l फिर महाराज अंबरीष ने तुलसी का जल पी लिया और तुलसी का जल पीकर उन्होंने पारण कर लिया l तब अचानक दुर्वासा मुनि वहां पर आ गए और उन्होंने देखा कि अब महाराज ने जलपान कर लिया हैै l  वह अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने क्रोध में भरकर अपनी जटाओं से एक शिखा को उखाड़ लिया l उसे जमीन पर दे मारा l उस जटा से वहां पर एक भयंकर ज्वाला उत्पन्न हो गई l वह ज्वाला महाराज अंबरीष  मारने के लिए तत्पर हो गई l आगे बढ़ने लग गई l तब अचानक भगवान श्री हरि का जो सुदर्शन चक्र है , वह प्रकट हो गया l सुदर्शन चक्र ने उस भयंकर ज्वाला को शांत कर दिया l उसके पश्चात  सुदर्शन चक्र दुर्वासा मुनि को मारने के लिए उद्धत हो गया l दुर्वासा मुनि को अपने प्राण संकट में जान पड़े l वह अपने प्राणों की रक्षा के लिए इंद्रलोक जाने लग गए l स्वर्ग लोक को चले गए l स्वर्ग लोक में जाने के पश्चात देवराज इंद्र से प्रार्थना की l देवराज इंद्र ने अपनी असमर्थता प्रकट की l दुर्वासा मुनि ब्रह्म लोक को गए l ब्रह्मलोक मे ब्रह्मा जी ने मना कर दिया l फिर उसके पश्चात कैलाश पर्वत पर गए l
उसके पश्चात दुर्वासा मुनि वैकुंठ लोक में भगवान श्री हरि के पास गए थे l भगवान श्री हरि ने कहा कि मैं आपका कोई भी कार्य नहीं कर सकता क्योंकि मैं भक्तों के अधीन हूं l मुझे लक्ष्मी,  वैकुंठ अत्यंत प्रिय नहीं है l मुझे मेरा भक्त प्रिय है l तब दुर्वाषा मुनि वापस महाराजा के पास आए और उन्होंने उससे  माफी मांगा l महाराजा ने माफ कर दिया l


       

                          गुंडिचा मन्दिर


गुंडिचा मन्दिर भगवान जगन्नाथ के मंदिर से 3 किलोमीटर दूर स्थित है l माता गुंडिचा जी भगवान जगन्नाथ को पुत्र के समान प्रेम करती हैं | भगवान माता गुंडिचा से मिलने के लिए जाते हैं और वहां पर 9 दिनों के लिए ठहरते हैं l भगवान जगन्नाथ, भगवान बलराम और  भगवती सुभद्रा माता गुंडिचा जी  को  सुख प्रदान करते हैं l 9 दिनों के पश्चात भगवान वापस अपने मंदिर को आते हैं l उस समय माता लक्ष्मी भगवान के रथ का एक पहिया तोड़ देती हैं और चली आती है | उस समय माता लक्ष्मी को क्रोध आता है, इसीलिए उसी को दर्शन कराने हेतु किया जाता है l

Gundicha Temple is located 3 km away from the temple of Lord Jagannath. Mata Gundicha ji loves Lord Jagannath like a son. Lord Mata goes to meet Gundichaal and stays there for 9 days. Lord Jagannath, Lord Balarama and Bhagwati Subhadra provide happiness to Mata Gundicha ji. After 9 days the Lord comes back to his temple. Mother Lakshmi breaks a wheel of the chariot of God and walks away. At that time Mata Lakshmi gets angry, that's why it is done to have her darshan.

              Infinite names of Shri Krishna


Lord Shri Krishna has infinite names. And Anant names also mean infinite. One of the names of God is Vasudev. Vasudev means the one whose body contains crores and crores of universes. Another name of God is Sankarshana. Sankarsana means the one who holds the whole universe on his head.

Lord Krishna is another name - Aniruddha. In the Mahabharata, Aniruddha is described as the form of God from whom Brahma was born.
            
                     श्री कृष्ण के अनंत नाम

 भगवान श्री कृष्ण के अनंत नाम है l और अनंत नामों का मतलब भी अनंत है l भगवान के  नामों में से एक नाम है वासुदेव l वासुदेव का मतलब है, जिसके शरीर के  रोए में करोड़ों करोड़ों ब्रह्मांड समाए हो l  भगवान का दूसरा नाम है संकर्षण l संकर्षण का मतलब है  -  पूरे ब्रह्मांड को अपने  मस्तक पर धारण करने वाले l 

 भगवान कृष्ण दूसरा नाम है  - अनिरुद्ध l महाभारत में अनिरुद्ध को भगवान का वह रूप बताए गया है, जिससे  ब्रह्मा उत्पन्न हुआ l इसका मतलब है सारा का सारा ब्रह्मांड भगवान कृष्ण के अनिरुद्ध रूप से उत्पन्न हुआ |


 भगवान श्री कृष्ण का अगला नाम है - नारायण l नारायण का अर्थ होता है जो ब्रह्मांड के समाप्त हो जाने
 पर भी स्थित रहे, उसी को नारायण कहते हैं l भगवान श्री कृष्ण का अगला नाम है - शेष l


भगवान नारायण शेषनाग की शय्या पर शयन करते हैं, इसलिए उनका एक  नाम है - शेष l
भगवान श्री कृष्ण का अगला नाम है - अच्युत l
 भगवान श्री कृष्ण के अंदर जितने भी गुण है, वह हमेशा सदैव रहते हैं l इसीलिए उनका दूसरा नाम है - अच्युत l भगवान श्री कृष्ण कभी भी अपने पद से नहीं गिरते हैं l 

The next name of Lord Shri Krishna is Narayan. Narayan means the one who remains situated even after the end of the universe, he is called Narayan. 
The next name of Lord Shri Krishna is Shesh. Lord Narayan He sleeps on the bed of Sheshnag, that's why his one name is Shesha. Another name is Achyut. Lord Shri Krishna never falls from his position.




            Happy Birthday to you

It is told In the Caitanya Charitamrita, every living organisms in this world is a devotee of the Lord Krishna. The real  spiritual master is a direct link between the devotee and the Supreme Lord. IT is said that although  today world is full of unpleasant things. But the devotee who wants to progress spiritually must be firmly convinced of this fact.

 कुछ अमूल्य चिन्ह देखकर भगवान प्रकट होते हैं। कई प्रकार के पुराणों और पुस्तकों ने समझाया कि श्री कृष्ण स्वयं भगवान हैं। भक्तों की सिद्धि के लिए भगवान मनुष्य लोक में आते हैं। भगवान श्री कृष्ण हमेशा भक्तों की मनोकामना पूरी करते थे और लीलावैचार्य के माध्यम से भक्तों को सुख देते थे। भगवान श्री कृष्ण विभिन्न प्रकार के लीलावैचित्र्य दिखाते हैं जो भक्तों और ऋषियों के दिल को छूते हैं। अपने प्रिय रिश्तेदारों के प्यार की पूर्ति के लिए श्री कृष्ण कई लीलाएँ करते थे। भगवान श्रीकृष्ण के चरण कमलों में सोलह चिह्न हैं। भगवान श्रीकृष्ण के अद्भुत कमल चरणों में ध्वज, छंद, अंकुश, यव, स्वस्तिक, उद्ध' रेखा और अष्टकोणीय, इंद्रधनुष, त्रिकोण, अर्धचंद्र, आकाश, मछली और गोशपद के प्रतीक शामिल हैं। 
अंतिम शेष चिन्ह एक जामुन के आकार का है।


All review comments

write Krishna as Bake bihari
Give more details.
Jai Shree Krishna
Nice one!!
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